जदयू में जो भी हुआ BJP के नजदीक, Nitish ने उसे बताई औकात!
पटना : नीतीश कुमार जदयू के सर्वमान्य नेता हैं। लेकिन अपने सबसे करीबी आरसीपी का राज्यसभा टिकट काटने का जो ताजा कदम उन्होंने उठाया, वह कोई नया नहीं। इससे पहले नीतीश, जार्ज फर्नांडीज, दिग्विजय सिंह, उपेंद्र कुशवाहा और शरद यादव के साथ भी ऐसा कर चुके हैं। जो मूल बात है, वह यह कि जदयू के जिस किसी भी नेता ने केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा नीत एनडीए सरकार से करीबी रिश्ता कायम किया, उसे नीतीश कुमार ने बाहर का रास्ता दिखा दिया या उसके सियासी कद पर कैंची चला दी।
जॉर्ज से लेकर शरद तक, किसी को नहीं बख्सा
आरसीपी सिंह और उनसे पहले जॉर्ज फर्नांडीज, दिग्विजय सिंह, उपेंद्र कुशवाहा तथा शरद यादव में बस यही समानता है कि ये सभी नेता एनडीए में रहते हुए केंद्रीय कैबिनेट में शामिल रहे और भाजपा से काफी निकटता रखी। लेकिन नीतीश कुमार ने किसी को भी नहीं बख्सा। नीतीश कुमार इन नेताओं के बढ़ते कद को जदयू और बिहार में अपनी सीएम कुर्सी के लिए बड़ा खतरा मान रहे थे। इसके अलावा वे इनकी बढ़ती महत्वाकांक्षाओं को भी खूब समझ रहे थे क्योंकि वे कभी नीतीश के काफी करीब हुआ करते थे।
क्यों करते हैं नीतीश कुमार जदयू नेताओं से ऐसा?
नीतीश कुमार शुरू से जदयू पर एकक्षत्र पकड़ रखने की नीति पर चले। अपनी पार्टी के आधार राज्य बिहार की कुर्सी के लिए वे इसे जरूरी मानते हैं। ऐसे में एनडीए में रहते हुए केंद्र की बड़ी पार्टी भाजपा से निकटता रखने वाले नेता उन्हें फूटी आंख भी नहीं भाए। वे इन नेताओं के केंद्र सरकार की नजर में बढ़ते कद और असर—रसूख को जदयू में अपने लिए बड़ा खतरा समझते हैं। यही कारण है कि जब भी जदयू का कोई बड़ा नेता—चाहे जॉर्ज हों या दिग्विजय, शरद या अब आरसीपी सिंह, नीतीश कुमार ने सबके पर कतरने में कोई कोताही नहीं की।
जॉर्ज, दिग्विजय और शरद…के साथ हुआ क्या था?
नीतीश की जॉर्ज से अदावत सियासी रही थी। जनता दल के काल में जहां जॉर्ज जेल में रहते मुजफ्फरपुर से लोकसभा चुनाव जीत गए थे, वहीं तब नीतीश को टिकट भी नहीं मिला था। बिहार में जब एनडीए का नेता चुनने की बारी आई तब जॉर्ज ने नीतीश को आगे नहीं किया था। तब अरुण जेटली और वाजपेयी के चलते नीतीश को बिहार में एनडीए का नेता चुना गया। केंद्र से जॉर्ज की नजदीकी को नीतीश बिहार में अपने लिए परेशानी समझते थे। इसीलिए उन्होंने 2009 में उन्हें टिकट ही नहीं लेने दिया। इसी प्रकार दिग्विजय सिंह के बढ़ते कद और केंद्र से निकटता के कारण उन्हें भी जदयू टिकट नहीं दी। कुशवाहा, शरद और अब आरसीपी के साथ भी कमोबेश यही परिस्थिति सामने आई तो नीतीश ने उन्हें भी क्रमश: 2011 से 2017 के दरम्यान जदयू से बाहर का रास्ता दिखा दिया। हालांकि कुशवाहा सियासत में काफी कुछ गंवाने के बाद किसी तरह फिर जदयू में वापस आने में सफल रहे।