नवादा जिले के कौआकोल प्रखंड के गाय घाट गांव के पास स्थित मरफ़ा देवी मंदिर के निकट ग्रामीणों ने सोमवार से श्रमदान कर हाल ही में मरम्मत कर बनाए गए आहर के अलंग पर घास रोपण प्रारंभ किया। रोहण नक्षत्र में बारिष के बाद नया भराव वाली मिट्टी पर दूब जैसे घास आसानी से लग जायेंगे। प्रकृतिक उपाय से आहर को बचाने का यह उपाय किया गया। वन विभाग इस काम में ग्रामीणों का सहयोग कर रहा है।
यह क्षेत्र वनवासियों का है। इस क्षेत्र में आहर-पइन जैसे जलसंरक्षण के प्राचीन उपक्रमों को पुनर्जीवित व सुदृढ़ कराकर लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने इस क्षेत्र को सूखा की समस्या से मुक्त कराया था। इस गांव से कुछ किलोमीटर की दूरी पर जेपी द्वारा स्थापित सोखोदेवरा आश्रम है। आहर के तटबंध को सुरक्षित करने के लिए स्थानीय ग्रामीणों ने सोमवार से ही घास लगाना शुरू किया है।
बरसात के दिनों में जब आहर के अलंग पर लगे घास बड़े हो जायेंगे तब उसकी छंटाई कर पशु चारा के रूप में उपयोग हो सकेगा। आहर की मेढ़ को अलंग कहते हैं। पूर्व में बरसात शुरू होने के पहले आहर के अलंग पर उसके पेट से मिट्टी निकाल कर रखने की परंपरा थी। इसके साथ ही उसे देवता का स्थान मानकर उस पर पीपल, पाकड़ जैसे छायादार वृक्ष लगाया जाता था। बाद में वह परम्परा लुप्त होती चली गयी। मरफा देवी माता मंदिर से निकल कर ग्रामीण इस काम में लग गए।
गाँवों के परम्परागत जल निकायों के पुनरुद्धार और वन सम्पदा के संरक्षण और वृद्धि के लिए राज्य में सामूहिक प्रयास प्रारंभ किया गया है। “ पानी रे पानी”अभियान के संयोजक पंकज मालवीय ने कहा कि पानी, वन, पर्यावरण और जैव विविधता आदि प्रकृति के उपहार को समाज अच्छी तरह से जानता व समझता जरूर है, लेकिन वह सिर्फ कागजी ज्ञान तक सीमित रह गया है। क्योंकि इनके साथ हमारा व्यवहार बिल्कुल विपरीत हो रहा है और उसका परिणाम भी भुगत रहे हैं।
हमारे पूर्वज भले ही कम पढ़े-लिखे इंसान थे, लेकिन इनके महत्व को समझते थे और इनकी पूजा करते थे। आज आधुनिकता के प्रभाव में लोग अपनी परंपराओं को भूल गये, जिसके बाद विनाश का नजारा एक के बाद एक कर सामने है। पूर्वजों ने जिसकी पूजा की, उस नदी, तालाब आदि को हम समाप्त कर चुके हैं। एक बात समझना बहुत ज़रूरी है कि आज पृथ्वी पर ग्लोबल वार्मिंग से लेकर पानी की कमी तक का कारण अपनी परंपराओं को भूल जाना है और एक बात यह भी स्पष्ट है कि लोक चेतना ही इस संकट से हमें बचा सकती है। क्योंकि यह केवल सरकार ही नहीं, बल्कि हमारी भी जवाबदेही है।
पानी रे पानी अभियान का मुख्य मकसद वन क्षेत्र और नदियों के किनारे बसे गांव में जाकर लोगों को जंगल , नदियों, तालाब समेत परम्परागत जल श्रोतों के महत्व और वर्तमान की स्थितियों से वाक़िफ़ करना और उनकी रक्षा के लिये जनप्रयास को प्रेरित करना है।
मालवीय ने वन और जैव विविधता के महत्व पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि जैव विविधता,जीवों के बीच पायी जाने वाली विभिन्नता है,जो प्रजातियों में, प्रजातियों के बीच और उनकी पारितंत्रों की विविधता को समाहित करती है। इसमें सभी प्रकार के जीव-जंतु और पेड़-पौधे व वनस्पतियां शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि जैव विविधता से ही इंसान सहित समस्त जीवों की भोजन, चारा, कपड़ा, लकड़ी, ईंधन आदि आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। ये रोगरोधी और कीटरोधी फसलों की किस्मों का विकास करती है, जिससे कृषि उत्पादकता अधिक होती है।
औषधीय आवश्यकताओं की पूर्ति जैव विविधता से आसानी से हो जाती है, तो वहीं पर्यावरणीय प्रदूषण को नियंत्रित करने में जैव विविधता का अहम योगदान है। इसके अलावा कार्बन अवशोषित करना और मिट्टी के गुणवत्ता में सुधार करने में भी इसका अनुकरणीय योगदान है। एक प्रकार से जैव विविधता पृथ्वी पर जीवनचक्र को बनाए रखती है। ऐसे में इसकी रक्षा कर हम अपने वर्तमान और भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं।