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फिल्म समीक्षा: सीरियस मेन की नाॅनसीरियस मेकिंग

21वीं सदी में तेजी से बदलते तकनीक ने सिनेमा पर भी बहुत असर डाला है। हाल के वर्षों में डिजिटल मंच पर सिनेमा देखना सुलभ हुआ है। इस मंच की एक और खासियत है कि इस पर जो फिल्में रिलीज होती हैं उन पर सेंसर की कैंची का भय नहीं होता है। इस भय मुक्ति के कारण एक लाभ है कि इसमें फिल्मकार खुलकर अपनी रचनात्मकता का प्रयोग कर सकता है। लेकिन, जिस तरह के कंटेंट ओटीटी पर परोसे जा रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि सेंसर बोर्ड से मुक्ति का लाभ रचनात्मकता में प्रयोग के बजाय अपनी कुंठा को जाहिर करने में उठाया किया जा रहा है।

हाल ही में सुधीर मिश्रा निर्देशित सीरियस मैन ओटीटी पर रिलीज हुई। मुख्य भूमिका में नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे मंझे हुए कलाकार से सजी यह फिल्म अपने आप में कई बातें कहती हैं। यह फिल्म मनु जोसेफ के उपन्यास ’सीरियस मेन’ (2010) पर आधारित है। उपन्यास प्रकाशित होने के दस साल बाद उस पर फिल्म बनी है। लेकिन, उपन्यास में जिन विसंगतियों का वर्णन किया गया है, वे आज भी जस की तस है। मनु जोसेफ की दूरदृष्टि ने समाज के असाध्य समस्याओं को अपने उपन्यास में रेखांकित किया था, जिसे सुधीर मिश्रा ने अपने तय दृष्टिकोण से फिल्माया है।

मुंबई स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में अय्यन मनी (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) संस्था के प्रमुख डाॅ. अरविंद आचार्य (नासिर) के सहायक के रूप में कार्यरत है। वैज्ञानिक शोधों और विज्ञान के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों पर वह भिन्न सोच रखता है। यह अलग बात है कि बाॅस उसे छोटी-मोटी बातों पर झिड़कते रहते हैं। फिर भी, अपने बेटे आदि मनी को स्कूल में नाम लिखाने के लिए वह अपने बॉस डाॅ. आचार्य से सिफारिश करवाता है और अपने बेटे को अपने बॉस की तरह ही बड़ा वैज्ञानिक बनाना चाहता है। इस चाह में व अपने बेटे को किस प्रकार एक रोबोट की भांति तैयार करने लगता है और उसके इस ’विचित्र तैयारी’ का लाभ कैसे कोई राजनीतिक दल लेना चाहता है, इसका चित्रण इस फिल्म में किया गया है।

सुधीर मिश्रा संवेदनशील फिल्मकार हैं। लेकिन, पूर्वाग्रह से ग्रस्त होने का बैगेज अपने साथ लेकर चलते हैं। पूरी फिल्म एक छोटे से बच्चे, उसकी शिक्षा, अभिभावकों की सोच और वैज्ञानिक शोध के मिश्रण से तैयार है। फिर भी उसमें अनावश्यक दृश्य और फूहड़ गालियां डालकर उन्होंने इस फिल्म के क्षितिज को बौना कर दिया है। अगर इस फिल्म में एकाध अंतरंग दृश्यों और गालियों से परहेज किया जाता, तो बाल शिक्षा और बच्चों की परवरिश के विषय पर एक शानदार फिल्म हमें देखने को मिलती। तब यह भी संभवना थी कि बाल फिल्म महोत्सव के लिए ’सीरियस मेन’ एक आदर्श पसंद होती। लेकिन, नैतिक शुचिता को अनादृत कर मिश्रा ने वह मौका गंवा दिया।

इस फिल्म के कथानक का स्थापन एक विज्ञान शोध संस्थान में होता है। उससे प्रतीत होता है कि यह फिल्म विज्ञान के क्षेत्र में हो रहे शोध कार्यों पर केंद्रित होगी। लेकिन, जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, कथानक के केंद्र में बालक आदि मनी आ जाता है। फिल्मकार ने एक बालक को केंद्र में रखकर सूक्ष्म तरीके से राजनेताओं द्वारा अपने लाभ के लिए आम जनता का मोहरे की तरह इस्तेमाल का चित्रण किया है। एक संवाद पर गौर कीजिए नवाजुद्दीन सिद्दीकी का किरदार कहता है- ’’इस देश में लोगों को मंदिर-मस्जिद की बातों से फर्क पड़ता है, विज्ञान संस्थान में क्या हो रहा है इसे किसी को फर्क नहीं पड़ता।’’ फिल्मकार ने इस फिल्म में राजनेताओं की महत्वकांक्षी विज्ञान संस्थानों में चल रही राजनीति, उच्च पद पर बैठे लोगों की पदलोलुपता, जातीय भेदभाव, घरेलू हिंसा, अभिभावकों की महत्वाकांक्षा का अपने बच्चों पर थोपा जाना, राजनीतिक सौदेबाजी में आम जनता का दोहन होना जैसी कई बातों को सरल तरीके से प्रस्तुत किया है। इसके लिए फिल्मकार की प्रशंसा होनी चाहिए।

फिल्म के सिनेमैटाग्राफर अलेक्जेंडर सर्काला ने मुंबई के निम्नमध्यम वर्ग के रहन-सहन को बखूबी अपने कैमरे से फिल्माया है। वे चेकोस्लोवाकिया निवासी हैं, फिर भी उन्होंने मुंबई के मर्म को समझा है।
कोरोनाकाल में जब सिनेमाघर बंद हैं, ऐसे में ओटीटी मंच पर फिल्में आ रही हैं इस नए मंच ने प्रयोगधर्मी फिल्मकारों को एक अवसर प्रदान किया है। लेकिन, फिल्मकारों की तरफ से भी एक नैतिक कर्तव्य का पालन होना चाहिए कि ओटीटी के खुले आकाश का प्रयोग वह अपनी सृजनशीलता को प्रकट करने में करें, न कि अपनी कुंठाओं को यथार्थ का चोला पहनाकर व्यक्त करने में।