यहां इतिहास का जादू है

बिहार की राजधानी पटना अपने ऐतिहासिक 16 महाजनपदों में से सबसे शक्तिशाली ‘मगध’ राज्य के स्वर्णिम इतिहास के लिए जानी जाती रही है और इसी क्रम में प्राचीन वस्तुओं से बिहार का वृतांत सुनाता है, बुद्ध मार्ग स्थित पटना संग्रहालय। आम बोलचाल में लोग इसे जादूघर भी कहते हैं। विशाल क्षेत्र में फैले इस अद्भुत ‘जादू घर’ की सबसे अनूठी बात यह है कि यहाँ भगवान बुद्ध के वास्तविक अस्थि कलश को सुरक्षित रखा गया है जिसे 1958 में प्रसिद्ध जर्मन भारतविद एलोइस एन्टॉन फुहरर ने वैशाली में उत्खनन के बाद निकाला था। संग्रहालय के मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही शहीद पीर अली गुलाब वाटिका मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती है, जिसका संरक्षण 8वीं शताब्दी में बना द्वार स्तम्भ करता है।
बौद्धों का मक्का
1917 ईस्वी में बने पटना संग्रहालय को ‘बौद्धों का मक्का’ भी कहा जाता है। रोमन—डच वास्तुकला का बेजोड़ नमूना इस संग्रहालय के दो मंज़िला भवन के भीतर कई कला दीर्घा हैं जो केवल बिहार ही नहीं, समूचे भारत की कलाकीर्तियों, महात्मा गाँधी जैसे महापुरुषों एवं विदेश से प्राप्त कलावस्तुओं को प्रस्तुत करता है। एक ओर जहाँ बापू को श्रद्धांजलि देती कला दीर्घा है जिसमें कई कलाकारों द्वारा उनकी तस्वीरों को विभिन्न माध्यम से प्रदर्शित किया गया है वही दूसरी ओर पंडित राहुल सांकृत्यायन संग्रह दीर्घा है जहाँ उनके द्वारा तिब्बत से संकलित ‘थंका’ चित्र (कपड़ों पर बने चित्रों को तिब्बत में थंका कहते हैं), ब्लाक चित्र, धातु एवं लकड़ी की मूर्तियां प्रदर्शनी के लिए लगाई गयी है। यहाँ प्रसिद्ध पांडुलिपियाँ भी पंडित राहुल के चित्र के साथ रखी गयी हैं। इसके साथ-साथ ही भारत में पाए जाने वाले पशु-पक्षियों के प्रतिदर्श, भारतीय चित्रकलाओं जैसे राजस्थानी, पहाड़ी तथा मुग़ल चित्रशैली, धातु कला दीर्घा, यूरोपियन कांस्य कलाकृतियां एवं जावा से प्राप्त काष्ठ कला का भी संग्रह है।
20 करोड़ साल पुराना वृक्ष
20 करोड़ साल पुराने वृक्ष के जीवाश्म को संजोए पटना संग्रहालय में हर दिन लगभग 600 आगंतुकों का आना होता है। केवल यही नहीं बौद्ध धर्म को मानने वाले विदेशी पर्यटकों की सूचि में भी पटना संग्रहालय का नाम शुमार होता है। 2014 से प्राचीन पाटलिपुत्र की देखभाल कर रहे संग्राहलयाध्यक्ष डॉ. शंकर सुमन मानते हैं कि 100 साल से पुराने आयु वाले इस म्युज़ियम को किसी प्रचार की आवश्यकता नहीं है। आज भी बौद्ध धर्म के अनुयायी यहाँ स्वतः ही खिंचे चले आते हैं। हाल ही में बने बिहार संग्रहालय के कारण पटना के इस संग्राहलय में कुछ हद तक पर्यटकों के भीड़ बँट तो गयी है पर इसका असर दोनों ही जगहों पर कम या ज़्यादा नहीं है। डॉ. सुमन ने बताया कि कई वस्तुओं को यहाँ से बिहार संग्रहालय भेजा जा रहा है जिन्हें दो भागों में बाँटा गया है, सन 1764 ई. से पहले की सभी चीज़ों को बिहार म्युज़ियम भेजने का फैसला किया गया है।
अतीत को जानने का जरिया

कई अभिवावक अपने बच्चों के साथ संग्रहालय भ्रमण के लिए आये थे, ताकि वे भी बिहार के इतिहास को देखे और समझे। ऐसे ही एक अभिवावक चन्दन कुमार, जो पटना के ही निवासी हैं वो तीसरी बार संग्रहालय आये हुए थे और अपने बच्चों को सभी दीर्घाओं से अवगत करा रहे थे | उनसे ये भी मालूम हुआ कि पटना संग्रहालय में पहले के मुकाबले अब और भी वस्तुओं की प्रदर्शनी लगाई गयी है।
राजधानी पटना की भूमि पर बने इस संग्रहालय में बिहार के धरोहरों को इसी उम्मीद के साथ संग्रहित किया गया है, ताकि देश-विदेश के लोग नालंदा विश्वविद्यालय, विश्व शांति स्तूप और मधुबनी चित्रकला की इस धरती को समझें और आज के दौर में बनी इसकी तस्वीर को और गौरवशाली बना सकें।
(भूमिका किरण)